Social Story: रात के तकरीबन 10 बज चुके हैं. गंगा और गंडक के संगम पर बहती हवा में ठंडक है, पर इस ठंडक के भीतर एक अजीब सी बेचैनी तैर रही है. चांद आसमान में अपने पूरे शबाब के साथ मौजूद है, लेकिन लगता है कि उसे भी अंदाजा है कि उस के नीचे एक ऐसी दुनिया बसती है, जिसे उजाला भी छूने से डरता है.
सोनपुर मेले का मैदान दूरदूर तक फैला हुआ है. दिन में जहां यही जगह पशुओं की आवाजों से भरी रहती है, वहीं रात का रंग कुछ और ही होता है. आवाजें बदल जाती हैं, ताल बदल जाती है और लोगों की भीड़ किसी और ही चाह में इकट्ठा होने लगती है. ऐसा लगता है जैसे 2 मेलों की 2 दुनिया एक ही धरती पर उगती हैं… एक दिन में और दूसरी रात में. दिन का मेला पशुओं का है, रात का मेला लड़कियों का और इन दोनों दुनिया के बीच कहीं, एक रोशनी से भरा थिएटर खड़ा है, जिस के भीतर कलाकार हैं और बाहर दर्शक. पर जिस दुनिया में वे रहते हैं, वहां कलाकार होना ‘सुख’ नहीं, बल्कि ‘जद्दोजेहद’ का दूसरा नाम है.
सोनपुर, जहां दिन में व्यापार होता है, बूढ़े हाथी बिकते हैं, किसान अपनी जरूरतें खरीदते हैं, व्यापारी अपनी दुकानें सजाते हैं, वहीं रात होते ही एक दूसरी दुनिया उभर आती है. भीड़ के बीच से छनती तेज रोशनियां, लाउडस्पीकरों पर बजते मिक्स गीत, और हर मंच की ओर बढ़ती हजारों आंखें पर इन में से किसी को भी अंदाजा नहीं है कि इस चकाचौंध के पीछे क्या कीमत चुकानी पड़ती है.
आंखों में बसती थकान, मेकअप छिपा नहीं सकता स्टेज पर खड़ी हर लड़की के चेहरे पर मेकअप की कई परतें होती हैं, पर जिंदगी की दरारें इन परतों से नहीं छिपतीं. एक लड़की ने बात ही बात में कहा, ‘‘कपड़ा जितना छोटा, उतना नोट ज्यादा. पूरा शरीर तोड़ डालते हैं पर कहते हैं कि ‘आखिरी तक मुसकराना’. हम भी मुसकराते हैं, क्योंकि रोना किसी को पसंद नहीं आता. ‘‘कपड़े जितने छोटे होते हैं, लोग उतना पैसा लुटाते हैं. हमारी आंखों का रंग भी असली नहीं रहता. स्टेज पर जाने से पहले नीला लैंस लगाती हूं. पीरियड में भी नाचना पड़ता है. लोग कहते हैं कि हम नाचते हैं, क्योंकि हमें यही आता है पर किसी ने यह नहीं पूछा कि हम ने क्या खो कर यह सीखा?’’ मेकअप कर रही 17 साल की एक लड़की बोली, ‘‘हम तो गांव के मेले में नाचते थे. यहां आ गए तो पता चला कि यहां नाच नहीं, तन दिखाना ज्यादा जरूरी है. पहली बार बहुत रोई थी पर घर में खाने को कुछ नहीं था.’’
उस लड़की की आवाज में कोई ड्रामा नहीं, कोई शिकायत नहीं. बस, एक लंबा जमा हुआ सच है. ऐसा सच, जिसे मेले की भीड़ देखने नहीं आती, पर उस की बदौलत ताली जरूर बजाती है. जहां जानवरों का मेला लगता है, वहां लड़कियों का नाच भी दिखाया जाता है. सोनपुर मेला दुनिया का सब से बड़ा पशु मेला है. यह बात हर गाइड, हर पंपलैट, हर इतिहासकार लिखता है और यह सच भी है. दिन में तंबुओं में बंधे हाथी, रस्सी से बंधे घोड़े, चमकदार काठी वाले ऊंट और अनगिनत पालतू जानवरों को देखने हजारों लोग आते हैं. किसान उन का दांत देखते हैं, चाल देखते हैं, वजन देखते हैं, बरताव देखते हैं, लेकिन जैसे ही शाम ढलती है, वही मैदान, वही तंबू किसी और रंग में रंग जाते हैं.
दिन में जहां जानवर बिकते हैं, रात में वहां लड़कियों के नाच बिकते हैं. मजबूरी और जिंदगी की कीमत सोनपुर मेले या किसी दूसरे मेले में नाचने वाली लड़कियों की माली हालत आमतौर पर बेहद कमजोर होती है. ज्यादातर लड़कियां गरीबी, अनाथालय या टूटे परिवार से आती हैं. उन के पास औप्शन बहुत सीमित होते हैं, जैसे स्कूल छोड़ना, घर चलाना या परिवार का पालनपोषण करना. यही वजह है कि वे थिएटर में काम करने को मजबूर होती हैं. हालांकि स्टेज पर उन के नाच के बदले उन्हें पैसे मिलते हैं, लेकिन वह रकम उन की मेहनत, थकान और जोखिम के मुताबिक नहीं होती.
कभीकभी उन्हें सिर्फ खानेपीने, सफर और छोटेछोटे खर्चों के लिए ही भुगतान मिलता है. उन के लिए स्टेज एक ऐसा व्यवसाय है, जो आज जीविका दे सकता है, पर अच्छा भविष्य नहीं. थिएटर मालिकों का रवैया थिएटर मालिक आमतौर पर इन लड़कियों को एक ‘प्रोडक्ट’ के रूप में देखते हैं न कि इनसान के रूप में. स्टेज पर उन की चमक, थिरकन और आकर्षण ही उन की कीमत तय करती है. कुछ मालिक कलाकारों की सिक्योरिटी, भोजन और सेहत का ध्यान रखते हैं, पर ज्यादातर केवल कमाई और दर्शकों की तादाद पर फोकस करते हैं. लड़कियों के दर्द, सेहत और मानसिक हालात को नजरअंदाज किया जाता है. अगर कोई प्रदर्शन में नाकाम होती है या कमजोर पड़ती है, तो उसे धमकाया जाता है, काम से हटा दिया जाता है या अगले शो में जगह नहीं दी जाती है.
इज्जत की हिफाजत, सब से कमजोर कड़ी थिएटर की लड़कियों के लिए सब से बड़ा खतरा उन की इज्जत का होता है. स्टेज पर उन के शरीर को नजरों के सामने लाया जाता है और कई बार दर्शक की छेड़छाड़, गालीगलौज, वीडियो बनाना या स्टेज के पीछे दबाव डालना आम बात हो जाती है. सिक्योरिटी का उपाय तकरीबन नाममात्र होता है और लड़कियां अपनी हिफाजत के लिए अकेली रहती हैं. अकसर वे अपनी इज्जत के लिए चुप रहने को मजबूर होती हैं, क्योंकि विरोध करने पर नौकरी या आमदनी छिन सकती है.
समाज में नजरअंदाज होना समाज में इन लड़कियों की हालत बहुत बुरी है. लोग उन की जद्दोजेहद और मेहनत को नहीं देखते, बस उन्हें ‘नाचने वाली’ के रूप में देखते हैं.
यह पेशा उन्हें इज्जत देने के बजाय बदनाम कर देता है. उन के पास शादी, स्थायी संबंध या सामाजिक सुरक्षा के मौके भी अकसर सीमित हो जाते हैं. समाज उन की मजबूरी को नजरअंदाज करता है और




