Hindi Kahaani. घर के पीछे उपले पाथती कजरी को जब उस की सास श्यामली ने बताया कि परसों मुंबई से कामता आ रहा है, तो वह खुशी से झूम उठी. गिर गए आंचल को गोबर सने हाथ से पकड़ सिर को ढकती हुई वह सास से पूछ बैठी, ‘‘किस ने बताया अम्मां?’’

‘‘सरस्वती बूआ के यहां हरीलाल का फोन आया था. उस ने बरखू की अम्मां को बुला कर बात की है. वही बता रही थी.

‘‘कामता के हाथ हरीलाल अपनी बीवीबच्चों के लिए कुछ चीजें भी भेज रहा है. यह बात भी उसी ने बताई है.’’

उपले पाथना बंद कर पानी से भरी बालटी में हाथ धो कर कजरी घर के भीतर जा कर उंगली पर दिन गिनने लगी. आज बैठेगा, कल नहीं, परसों तक आ जाएगा. कजरी के भीतर खुशी कुलांचें भरने लगी थी. उसे लग रहा था कि परसों आने में बरसों लग जाएंगे.

चारपाई पर बैठी सोचतेसोचते जब कामता का चेहरा कजरी की आंखों में उमड़ आया, तो उसे लगा कि सुहागरात वाले दिन की तरह वह अभी आ कर उसे पीछे से अपनी मजबूत बांहों में कस लेगा और उस के गाल पर एक चुंबन जड़ता हुआ कह देगा, ‘कजरी, तुम कितनी अच्छी लग रही हो?’

तब वह छटपटा कर उस से अलग होने की कोशिश करती हुई कह देगी, ‘हटो भी, तुम बड़े वो हो. अभी कोई देख लेगा तो?’ यह सोच कर उस के गाल गुलाबी हो गए थे.

कजरी का बस चलता, तो वह कामता को कभी भी परदेश न जाने देती. एक कोठरी वाले घर में एक ही चारपाई पर वह उस के साथ मेहनतमजदूरी कर के जिंदगी हंस कर गुजार देती.

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