Equality Struggle: दलित नौजवान – अपनी मशाल खुद बनें

Equality Struggle: हर साल 14 अप्रैल को ‘अंबेडकर जयंती’ के मौके पर ‘नीला गमछा’ गले में लटका कर डाक्टर भीमराव अंबेडकर की एक हाथ में संविधान पकड़े और दूसरे हाथ से आसमान को उंगली दिखाती मूर्ति के ‘चरणों’ में झुक कर गुलाब या गेंदे के ‘लालपीले फूल’ चढ़ा देने भर से अगर आप ने काले फ्रेम का चश्मा और कोटपैंट पहने इस इनसान की सोच पकड़ ली है, तो आप गलत दिशा में जा रहे हैं. आप की इस इनसान को ले कर भ्रामक सोच आज भी कायम है.

डाक्टर भीमराव अंबेडकर को सम झने के लिए हमें जातिवाद के उस जहरीले सांप को सम झना होगा, जिस ने अपने अहंकार में आज तक अपनी केंचुली भी नहीं बदली है. हमें समाज की बेकार सोच के उस कूड़ेदान से वह आईना बाहर निकालना होगा, जिस में शूद्रों को उन की परछाईं तक नहीं दिखती है. कितने भयावह हालात हैं न?

एक उदाहरण से समझते हैं. एक समय देश के सब से ज्यादा पढ़ेलिखे लोगों में शुमार डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने संविधान को ले कर अपने एक भाषण में कहा था, ‘मैं यहां पर संविधान की अच्छाइयां गिनाने नहीं जाऊंगा, क्योंकि मु झे लगता है संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, वह अंतत: बुरा साबित होगा, अगर उसे इस्तेमाल में लाने वाले लोग बुरे होंगे. और संविधान कितना भी बुरा क्यों न हो, वह अंतत: अच्छा साबित होगा, अगर उसे इस्तेमाल में लाने वाले लोग अच्छे होंगे.’

किसी इनसान के अच्छा या बुरा होने की इस से ज्यादा सटीक व्याख्या नहीं हो सकती, क्योंकि यह बात वह आदमी भरी संसद में बोल रहा है, जिसे अपने बचपन से ले कर आज तक जाति के नाम पर दुत्कार, पीड़ा और नफरत ही मिली है. आज भले ही उस ने अपनी पढ़ाईलिखाई से अपने विचारों को ‘शुद्ध’ कर लिया है, पर जब वह यह शिक्षा पा रहा था, तब स्कूल में उसे ‘अशुद्ध’ होने का ‘जातिगत तमगा’ देने वालों ने पूरी ‘श्रद्धा’ से चाहा था कि ब्रह्मा के पैर से जन्मा यह ‘अछूत’ अपने पुश्तैनी काम के बो झ तले दब कर कीड़ेमकोड़े की तरह मरखप जाए.

अब आज की बात करते हैं. इसी साल सितंबर का महीना और जगह उत्तर प्रदेश का बाराबंकी जिला. वहां के मसौली थाना इलाके के मलौली मजरे डापलिन पुरवा के रहने वाले निचली जाति के उदयभान निर्मल के मुताबिक, वह यूपीएसआई (उत्तर प्रदेश पुलिस सबइंस्पैक्टर) की तैयारी कर रहा था और इस के लिए वह चौराहे पर बनी क्वांटम लाइब्रेरी में रोजाना पढ़ने के लिए जाता था.

आरोप है कि रविवार, 21 सितंबर को दोपहर 2 बजे के बाद लंच हुआ और खाना खाने के लिए सभी छात्र एकत्र हुए. इसी बीच उदयभान निर्मल ने गलती से किसी दूसरे छात्र का टिफिन छू दिया. उस ऊंची जाति के प्रदुम्न ने जातिगत नफरत दिखाते हुए टिफिन दूर फेंक दिया.

पीडि़त छात्र उदयभान निर्मल के मुताबिक, प्रदुम्न ने टिफिन फेंकते हुए कहा कि तुम नीची जाति के हो, मेरे साथ बैठ कर खाना नहीं खा सकते. तुम्हारा काम जूतेचप्पल की मरम्मत करना है, पढ़ाईलिखाई करना तुम्हारा काम नहीं है.

पीडि़त उदयभान निर्मल आगे ने बताया कि प्रदुम्न ने जातिसूचक अपशब्द और गाली देने के बाद दोस्तों को फोन कर के बुला लिया और उस की बेरहमी से पिटाई कर दी. आगे कुछ कार्रवाई करने पर जान से मारने की धमकी दी.

बेइज्जती और मारपीट से दुखी दलित छात्र उदयभान निर्मल ने मसौली थाने में तहरीर दे कर कार्रवाई की मांग की है.

उदयभान निर्मल का कहना है कि वह प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है, लेकिन ‘शिक्षा के मंदिर’ (लाइब्रेरी) में भी जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा, जो बेहद दुखद और शर्मनाक है.

उदयभान ने भले ही अपने नाम के आगे ‘निर्मल’ लगा है, पर वह प्रदुम्न जैसे अगड़ी जाति वालों के मन का मैल धो नहीं पा रहा है. लाइब्रेरी, जहां शांत रह कर शिक्षा हासिल की जाती है, वहां भी प्रदुम्न के मन में ‘जातिवाद का शोर’ इतना ज्यादा हावी था कि उसे उदयभान की हलकी सी छुअन भी स्वीकार नहीं हुई.

‘तुम्हारा काम जूतेचप्पल की मरम्मत करना है, पढ़ाईलिखाई करना तुम्हारा काम नहीं है’ वाली यह सोच प्रदुम्न में अचानक से नहीं जन्मी है, बल्कि इसे तो उस के बड़े ने पालपोस कर विरासत में दिया है कि भले ही देश कितनी भी तरक्की कर जाए, संविधान कितना भी मजबूत हो जाए, पर ये दोनों तुम्हारे जूते की नोक पर रहेंगे, क्योंकि तुम ‘बह्मा की श्रेष्ठ संतान’ हो, ‘ब्लू ब्लड’ हो. तुम देश और संविधान से भी ऊपर हो. यह ‘वैचारिक बुल्डोजर’ सदियों से वंचित समाज को रौंदता आया है.

यहां सवाल उठता है कि क्या जातिवाद को खत्म करने के लिए पढ़ाईलिखाई को वंचितों का हथियार बनाया जा सकता है? हां, पर हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि निचली जाति के लोगों में पढ़ाईलिखाई को ले कर सोच क्या बनी हुई है.

पढ़ाई करने से हम देश, समाज और दुनिया के प्रति जागरूक होते हैं, अच्छा रोजगार पाते हैं, चार लोगों में अपने विचार रखने की सोच बना पाते हैं, पर साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि जिस देश और समाज में हम रह रहे हैं, उस पर धार्मिक कट्टरता बहुत ज्यादा हावी हो गई है. हर किसी को अपनेअपने ईश्वर की तलाश सी रहती है. यही वजह है कि वंचित समाज ने भी डाक्टर भीमराव अंबेडकर में अपना ईश्वर तलाशना शुरू कर दिया है. यह मूर्तिपूजा का ही नया रूप है, क्योंकि इस तलाश में भीमराव अंबेडकर के विचार तो दब गए हैं.

पाखंडी पंडेपुजारी तो चाहते हैं कि उन के मंदिरों में वे भक्त ही भेड़ की तरह सिर झुकाए चले आएं, जिन में दानपात्र भरने की ताकत है, फिर चाहे वे किसी भी समाज, समुदाय और जाति के क्यों न हों. फटेहाल दलित अंबेडकर की मूर्ति में उल झे रहें, नीले गमछे के बो झ में दबे रहें, नेता के भाषणों को सुनने वाली भीड़ बने रहें और थोड़ा सा बरगलाने पर ढेर सारे वोट सियासी रहनुमाओं के बैलेट बौक्स में दान स्वरूप चढ़ा दें, यही काफी है. वे बिना सिर के (बेदिमाग) वोटबैंक हैं, जिन्हें सिर्फ चुनाव में चूना लगाया जाता है.

यह सियासी प्रपंच तब और ज्यादा बढ़ा, जब हर नेता को यह लगा कि दलित समाज डाक्टर अंबेडकर के नाम पर एकजुट हो गया है या हो सकता है. नेताओं ने इसे अपना ‘दलित प्रेम’ बताया पर हकीकत में ऐसा नहीं है. हर दल इस समुदाय से ‘सियासी स्वार्थ’ साध रहा है, इन के घर भोजन करने की नौटंकी कर रहा है, इन्हें ‘सुरक्षित सीट’ से टिकट दे रहा है, पर भला कुछ नहीं कर रहा. खुद इस समाज से निकले नेता भी कागजी शेर बन कर रह गए हैं. अगड़ों का ‘यैसमैन’ कहलाने में इन्हें अलग तरह का सुख मिलता है.

इस बात को इस उदाहरण से सम झते हैं. ‘फौरवर्ड प्रैस’ में कंवल भारती का एक लेख छपा था, जिस में उत्तर प्रदेश में हाथरस जिले की इगलास सुरक्षित सीट से साल 2017 में चुने गए विधायक राजवीर दिलेर का जिक्र किया गया था. इन के पिता किशन लाल भी 5 बार के विधायक और एक बार के सांसद थे. पढ़ाईलिखाई इन की ज्यादा नहीं है.

राजवीर दिलेर के बारे में पत्रकार आलोक शर्मा की एक रिपोर्ट अखबार ‘टाइम्स औफ इंडिया’ में छपी थी, जिस के मुताबिक ये सवर्णों के यहां जमीन पर बैठते हैं, चाय के लिए अपना कप अपने साथ रखते हैं और कहते हैं कि ‘मेरे बाप भी जातिवाद मानते थे, और मैं भी मानता हूं’.

राजवीर दिलेर का सुरक्षित क्षेत्र जाटों का इलाका है, जिन की तादाद 90,000 है. इन्हीं के वोटों पर इस दलित की जीत निर्भर करती है. क्या इस विधायक से दलितों के लिए काम करने की उम्मीद की जा सकती है?

शायद नहीं, क्योंकि ऐसे नेता भी वोटबैंक की ताकत सम झते हैं. इन्हें भले ही ‘सुरक्षित सीट’ मिल जाती है, पर जब तक दूसरी जातियों का हाथ इन के सिर पर नहीं आता है, तब तक इन का जीतना बड़ा मुश्किल होता है.

जब नेताओं का ऐसा गठजोड़ बनता है, तो दलित तबके के गरीब और अनपढ़ लोग तो क्या, अच्छे पढ़ेलिखे और ‘वैल सैटल्ड’ लोग भी तन और मन से हताश हो जाते हैं. हरियाणा में आईपीएस वाई. पूरन कुमार की खुदकुशी का मामला इसी प्रशासनिक और राजनीतिक अंधेरगर्दी का नतीजा है, जहां एक बड़ा अफसर 7 अक्तूबर, 2025 को चंडीगढ़ में गोली मार कर अपनी जिंदगी खत्म कर लेता है.

आईपीएस वाई. पूरन कुमार आंध्र प्रदेश के रहने वाले थे. उन का जन्म 27 अक्तूबर, 1977 को हुआ था. उन्होंने आईआईएम अहमदाबाद से पीजीडीएमसी किया था. इस के बाद उन्होंने यूपीएससी की तैयारी की और ऐग्जाम क्लियर किया. वे साल 2001 बैच के हरियाणा कैडर के आईपीएस अफसर थे.

फिलहाल वाई. पूरन कुमार रोहतक रेंज के आईजी थे. 29 सितंबर, 2025 को ही उन का ट्रांसफर हुआ था. उन्हें अब रोहतक के सुनरिया में पुलिस ट्रेनिंग कालेज में आईजी के तौर पर पोस्टिंग मिली थी.

वाई. पूरन कुमार कई सालों से सिस्टम से परेशान थे. मई, 2021 में उन्होंने अंबाला के एसपी के सामने तब के डीजीपी मनोज यादव के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी. उन का आरोप था कि उन्हें उन की जाति के चलते परेशान और सताया जाता है.

नवंबर, 2023 में वाई. पूरन कुमार ने तब के मुख्य सचिव संजीव कौशल से उस समय के गृह सचिव टीवीएसएन प्रसाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की इजाजत मांगी थी. उन्होंने आरोप लगाया था कि उन की जाति के चलते उन्हें गैर कैडर पद पर तैनात किया गया था.

पिछले साल अप्रैल में वाई. पूरन कुमार ने साल 2024 के हरियाणा विधानसभा चुनावों से ठीक पहले चुनाव आयोग के सामने एक शिकायत दर्ज कराई थी, जिस में उन्होंने आरोप लगाया था कि आचार संहिता लागू होने के बाद 2 एजीजीपी को डीजीपी और 2 आईजी को एडीजीपी के तौर पर प्रमोट किया गया था.

अपने सुसाइड नोट में आपीएस वाई. पूरन कुमार ने 8 आईपीएस और 2 आईएएस अफसरों पर आरोप लगाए थे. उन्होंने जिन पर आरोप लगाया था, उन में 8 आईपीएस अमिताभ ढिल्लों, मनोज यादव, पीके अग्रवाल, संदीप खिरवार, सिबास कविराज, संजय कुमार, पंकज नैन और डाक्टर रवि किरण आदि के नाम शामिल हैं. इन के अलावा 2 रिटायर्ड आईएएस राजीव अरोड़ा और टीवीएसएन प्रसाद का नाम भी है.

अब आप सोचिए कि इतने बड़े रैंक का बड़ा सरकारी अफसर, जिस पर अपने इलाके में शांति और भाईचारा बनाने का दबाव रहता है, वह अपनी जाति की हीनता के बो झ तले दबाया जा रहा था. वह भी ऐसे लोगों द्वारा जो उसी के ‘प्रशासनिक भाईबंधु’ थे.

तो क्या जातिवाद का यह जहरीला सांप कभी भी केंचुली नहीं उतरेगा? चूंकि हमारे समाज में जातपांत बहुत गहरे तक पैठ जमाए हुए है, तो लगता है कि फिलहाल यह दूर की कौड़ी है, पर यहां एक बात जो बहुत ज्यादा अहम है, वह है इस बहुजन समाज की आपसी एकता, जिसे पढ़ाईलिखाई से और ज्यादा मजबूत किया जा सकता है.

दूसरा तरीका यह है कि जहां आप रहते हैं, उस घर, गली, महल्ले को व्यवस्थित करें. लोगों को यह मत सोचने दें कि उन का गंदगी या गरीबी में रहना पिछले जन्म का पाप है, जिसे वे आज इस जन्म में भोग रहे हैं. दुनिया की कोई भी ताकत आप को साफसुथरा और आप के आसपास की जगह को ‘नीट एंड क्लीन’ बनाने से रोक नहीं सकती है.

तीसरा, अपने आसपास के लोगों में फैली सामाजिक बुराइयों को जड़ से खत्म करने का बीड़ा उठाएं. आप कोई बड़े अफसर बने हैं, तो यह मत सम झें कि अब निकलो इस नरक से जहां हमारी पुरानी पीढि़यां जानवर से बदतर जिंदगी गुजार कर मरखप गईं. इस उलट आप की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि समाज के इस हिस्से को कैसे अंधविश्वास, नशाखोरी, बेरोजगारी, आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने से रोका जाए.

रास्ता दिखाने के लिए एक के हाथ में ही मशाल होना काफी है. अपनी मशाल खुद बनें. जातिवाद के अंधेरे से निबटने का यही एकमात्र रास्ता है. Equality Struggle

Caste Problem: मेरे स्कूल में सब मुझे एससी/एसटी कह कर चिढ़ाते हैं

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सवाल –

मेरी उम्र 16 साल है और मैं भरतपुर के एक गांव की रहने वाली हूं. हमारे गांव में एक ही स्कूल है और हमारे आसपड़ोस के सभी बच्चे उसी स्कूल में पढ़ते हैं. मैं जब भी स्कूल जाती हूं तो वहां सभी बच्चे मुझे एससी/एसटी कह कर चिढ़ाते हैं. मैं और मेरा परिवार दलित हैं तो हमें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. आसपड़ोस वाले भी हम से ज्यादा मतलब नहीं रखते, लेकिन मुझे ज्यादा दिक्कत अपने स्कूल में होती है. हर समय बच्चों का मुझे चिढ़ाना मेरे दिमाग में घूमता रहता है जिस की वजह से मैं पढ़ाई पर ध्यान भी नहीं दे पाती. मैं ने कई बार उन बच्चों की शिकायत अपनी क्लास टीचर से भी की, लेकिन उन्होंने इस बात कोई ऐक्शन नहीं लिया. आप ही बताइए कि मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब –

मुझे यह सुन कर काफी हैरानी हुई कि आज भी लोग जातपांत को ले कर अपनी सोच बनाए बैठे हैं. एससी/एसटी या फिर दलित होना कोई शर्मिंदगी की बात बिलकुल नहीं है. जब तक आप खुद अपनेआप को कमजोर दिखाती रहेंगी, तब तक सभी आप को परेशान करते रहेंगे और साथ ही चिढ़ाते भी रहेंगे.

आप अगर उन की बात को ले कर परेशान होती रहोगी तो ऐसे लोग आप को और भी ज्यादा परेशान करेंगे. आप को सिर्फ और सिर्फ अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए और साथ ही अगर आप उन लोगों को जवाब देना चाहती हैं तो अपने काम से दीजिए. पढ़लिख कर जब आप कुछ अच्छा कर रही होंगी, तब सब के मुंह अपनेआप बंद हो जाएंगे.

एक और बात, अगर आप को कोई एससी/एसटी कह कर चिढ़ाता भी है तो गर्व महसूस कीजिए. अगर आप अपनी जात को खुद ही नीचा दिखाएंगी तो लोगों का तो काम ही है कुछ न कुछ कहना. अगर आप शर्मिंदा होना बंद कर देंगी, तो वे सब आप को चिढ़ाना भी छोड़ देंगे.

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Caste Problem: एक दलित लड़का स्कूल में जबरदस्ती हमारे साथ आ कर बैठ जाता है

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सवाल –

मेरी उम्र 17 साल है और मैं 11वीं कक्षा का छात्र हूं. मेरे स्कूल में कई दलित छात्र हैं और उन में से 4-5 तो मेरी ही क्लास में हैं. जब भी खाने का या खेलने का वक्त होता तब उन में से एक बच्चा हमारे ग्रुप के साथ आ कर बैठ जाता है. हम सब उसे इग्नोर करने की कोशिश करते हैं, लेकिन फिर भी वह हमारे साथ आ कर खाना खाने लगता है. हमें काफी अजीब लगता है कि एक दलित लड़का हमारे साथ कैसे खाना खा सकता है. हम में से कोई उसे कुछ कह नहीं पाता लेकिन उसे खुद सोचना चाहिए कि उसे अपने जैसे बच्चों के साथ रहना चाहिए. आप ही बताइए हम ऐसा क्या करें कि वह हमारे पास न आए?

जवाब –

मझे समझ नहीं आ रहा कि आज के समय में भी आप ऐसी सोच रखते हैं और मुझे पूरी उम्मीद है कि आप के अंदर यह सोच या तो अपने घर वालों से या आसपड़ोस से आई होगी. हमारे देश में जातपांत जैसी समस्याएं बहुत समय पहले हुआ करती थीं, लेकिन आज भी कुछ लोग इसे मान रहे हैं, यह हैरानी की बात है.

आप खुद सोचिए कि अगर वह लड़का आप से दोस्ती करना चाहता है या आप के ग्रुप के साथ बैठना चाहता है तो इस से आप सब को क्या दिक्कत है. माना वह लड़का दलित है लेकिन अछूत तो नहीं है न. ऐसा आप से किस ने कहा कि दलित लोग सिर्फ दलित के साथ ही बैठेंगे. हो सकता है वह लड़का अच्छे दिल का हो और आप का अच्छा दोस्त बन जाए.

ऊंची जात और नीची जात जैसी धारणाएं अपने दिल और दिमाग से निकाल दीजिए. अगर आप का स्कूल ऐसी सोच रखता तो स्कूल ही उस बच्चे को एडमिशन न देता और अगर देता भी तो ऐसे बच्चों की अलग क्लास बनाता. स्कूल प्रशासन ने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वह सब को एक समान देखता है तो आप क्यों नहीं.

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Indian Constitution: मनुवादी विधान की जकड़न में संविधान

Indian Constitution: डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने शायद ही यह सोचा था कि उन के अनुयायी उन की बात को समझने के बजाय कोरा ‘जय भीम’ का जयजयकार करने लगेंगे. वे लोग समझ ही नहीं पा रहे हैं कि ‘जय गोपाल’, ‘श्रीराम’, ‘जय माताजी’ या ‘जय भीम’ सब मनु की परंपरा के परिचायक हैं.

भारतीय समाज में पिछड़ों और दलितों की दशा में सुधार लाने के लिए समाज के परंपरागत मजबूत तबकों से कड़ी जद्दोजेहद करते हुए संविधान सभा में पहुंचने के बाद दिनरात मेहनत कर के डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने संविधान का मसौदा तैयार करने में कामयाबी हासिल की थी. पर, बेहद अफसोसजनक बात है कि हमारे देश में 76 साल से लागू संविधान आज भी महज एक राजकीय दस्तावेज ही बन कर रह गया है.

भारत की सब से बड़ी दिक्कत यह है कि इस देश का संविधान भले ही डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने अपने ढंग से बनाया हो, पर इस संविधान की व्याख्या करने का पूरा काम आज भी मनु के कट्टर समर्थकों के हाथों में है, तभी तो राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ के सामने खड़ी मनु की प्रतिमा न्यायपालिका से संवैधानिक न्याय की उम्मीद से आने वालों को ठेंगा दिखा रही है.

गौरतलब है कि मनु का विधान हजारों सालों से इस देश के खून में घुला हुआ है, जिस ने गीता, धम्मपद, जिन्न सूत्र, गोरख वाणी, कबीर बीजक व गुरु ग्रंथ साहिब जैसी मजबूत आवाज को भी मुखर नहीं होने दिया है.

हालांकि, आधुनिक संविधान निर्माताओं ने अस्तित्व की आवाज की कोमलता को संविधान का हिस्सा नहीं बनने दिया. मनु की कठोरता से उपजे परंपरागत आरक्षण के जवाब में संवैधानिक आरक्षण की व्यवस्था भी की, पर क्योंकि मनु का विधान सदासदा से ही बेहद संरक्षित है, जिस का मूल कारण यह है कि यह विधिविधान सनातन धर्म व संस्कृति का चोला पहने हुए है.

लिहाजा, जो संवैधानिक व्यवस्थाएं इस देश की जिस 90 फीसदी आबादी के लिए की गई थीं, वही 90 फीसदी आबादी इन संवैधानिक व्यवस्थाओं के बजाय मनु की सनातन संस्कृति के धार्मिक विधान के अनुष्ठानों में लीन है.

यह दुख की बात है कि आजाद भारत के संविधान से वजूद में आई अदालतों में मनु की मूर्ति आज भी वैसी ही कुटिल मुसकान बिखेरती हुई संवैधानिक न्याय की उम्मीद में आए लोगों को चिढ़ा रही है.

आजादी के बाद वजूद में आई संवैधानिक व्यवस्था के कर्णधारों ने किसानों, मजदूरों व दलितों के लिए कुछ और ही उम्मीदें देखी थीं, तभी तो संविधान निर्माता ने संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत में इन्हीं उम्मीदों के साथ लिखा था, ‘हम भारत के लोग भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए…’

बंद हो कोर्ट में पूजापाठ

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अभय ओका ने कानूनी बिरादरी के लोगों यानी वकीलों और जजों को सलाह दी थी कि उन्हें कोर्ट में पूजापाठ से बचना चाहिए.

जस्टिस अभय ओका का कहना था कि कानूनी जगत में शामिल लोगों को किसी भी काम की शुरुआत संविधान की प्रति के सामने झुक कर करनी चाहिए.

वहीं, जिस वक्त जस्टिस अभय ओका वकीलों और जजों से पूजापाठ की जगह संविधान के सामने सिर ?ाकाने को कह रहे थे, उस वक्त सुप्रीम कोर्ट के एक और जज जस्टिस भूषण आर. गवई भी वहां मौजूद थे. उन्होंने बिल्डिंग के समारोह का नेतृत्व किया था.

इस कार्यक्रम के दौरान जस्टिस भूषण आर. गवई ने भी कहा, ‘‘संविधान को अपनाए हुए 75 साल हो चुके हैं, इसलिए हमें संविधान का सम्मान दिखाने और इस के मूल्यों को अपनाने के लिए इस प्रथा की शुरुआत करनी चाहिए.’’

जस्टिस अभय ओका ने खुल कर कहा, ‘‘अब हमें न्यायपालिका से जुड़े हुए किसी भी कार्यक्रम के दौरान पूजापाठ या दीप जलाने जैसे अनुष्ठानों को बंद करना होगा. इस के बजाय हमें संविधान की प्रस्तावना रखनी चाहिए और किसी भी कार्यक्रम को शुरू करने के लिए उस के सामने झुकना चाहिए.

‘‘कर्नाटक में अपने कार्यकाल के दौरान मैं ने ऐसे धार्मिक अनुष्ठानों को रोकने की कोशिश की थी, लेकिन मैं इसे पूरी तरह से नहीं रोक पाया था. हालांकि, मैं इसे किसी तरह से कम करने में कामयाब जरूर रहा.’’
जयपुर हाईकोर्ट में

मनु की मूर्ति

जयपुर हाईकोर्ट देश का अकेला ऐसा हाईकोर्ट है, जिस के परिसर में ‘मनुस्मृति’ लिखने वाले मनु की मूर्ति लगी हुई है.

यह बेहद दुख की बात है कि औरतों और दलितों के विरोधी और इनसानी बराबरी के दुश्मन मनु की मूर्ति कोर्ट में लगी हुई है, जबकि उसी कोर्ट के बाहर अंबेडकर की मूर्ति लगाई गई है, जो अनदेखी की शिकार है.

गौरतलब है कि ‘मनुस्मृति’ में औरतों व शूद्रों के बारे में बेहद ऊंचनीच भरी बातें लिखी गई हैं. डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने भी कहा था कि, ‘मनुस्मृति’ जाति की ऊंचनीच भरी व्यवस्था को मजबूत करती है, इसलिए उन्होंने 25 दिसंबर, 1927 को सरेआम ‘मनुस्मृति’ को जलाने की हिम्मत दिखाई थी.

साल 1989 में न्यायिक सेवा संगठन के अध्यक्ष पद्म कुमार जैन ने राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस एमएम कासलीवाल की इजाजत से मनु की इस बड़ी मूर्ति को लगवाया था. तब राज्यभर में खूब हंगामा मचा था और राजस्थान हाईकोर्ट की प्रशासनिक पीठ ने इसे हटाने के लिए रजिस्ट्रार के जरीए न्यायिक सेवा संगठन को कहा था.

लेकिन तभी हिंदू महासभा की तरफ से आचार्य धर्मेंद्र ने मनु की मूर्ति को हटाने के खिलाफ हाईकोर्ट में स्टे और्डर की याचिका लगा दी थी कि एक बार लगाई गई मूर्ति हटाई नहीं जा सकती. तब से ले कर आज तक केवल 2 बार ही इस मामले की सुनवाई हुई है. जब भी सुनवाई होती है, कोर्ट में टकराव का माहौल बन जाता है और मामला बंद कर दिया जाता है.

मनु की मूर्ति के विरोधियों का कहना है कि रोजरोज चिढ़ाते मनु का हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि मनुवाद फिर से बेहद मजबूत रूप से दोबारा उभर रहा है.

इस की वजह यह है कि दलित बहुजनों को मनु, मनुस्मृति, मनु मूर्ति और मनुवाद से अब कोई तकलीफ नहीं लगती है. अब वे वारत्योहार बतौर रस्म ‘जय भीम’ व ‘जयजय भीम’ चिल्लाते हैं. उन के लिए अंबेडकर का दर्शन महज प्रदर्शन की चीज बन कर रह गया है. Indian Constitution

Social Issue: दलितों ने बेचा दलितों को

Social Issue, लेखक – बलराम सिंह पाल

भारत में पिछड़े दलित तबके के हकों की बात तभी होती है, जब लोकसभा या विधानसभा के चुनाव होते हैं. उस समय टैलीविजन स्क्रीन के हर चैनल पर मीडिया तुरंत दिखाने लगती है कि इस राजनीतिक पार्टी की दलित वोट बैंक में इतनी पकड़, इस क्षेत्र में इतने दलित वोटर, इन का नेता ये, इस पार्टी का दलित वोटर का बैंक इतना, और यह सब होने के बावजूद इस समाज के ये बेचारे पिछड़े लोग ‘जय भीम’ के नारे लगाते हुए इन को वोट भी दे देते हैं. लेकिन चुनाव के बाद इन की हालत फिर भी वैसी की वैसी ही रहती है.

क्या इसी दिन के लिए डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने महात्मा गांधी के साथ साल 1932 में पूना समझौता किया था? इस दलित और पिछड़े तबके के कल्याण का दावा करने के लिए, इन के हक के लिए लड़ने को ले कर कई पार्टियों का गठन हुआ, जिस में सब से प्रमुख कांशीराम की लीडरशिप में बहुजन समाज पार्टी आई.

कांशीराम, जिन्होंने दलित तबके की जद्दोजेहद के लिए सवर्ण तबके के खिलाफ अपने तल्ख तेवर और तीखे नारे ‘ठाकुर, बाभन, बनिया छोड़, बाकी सब हैं डीएस4’ और ‘तिलक, तराजू और तलवार, इन को मारो जूते चार’ दिए.

इन नारों के दम पर बहुजन समाज पार्टी ने काफी हद तक दलित तबके के दिल में अपनी जगह बना ली थी, लेकिन मायावती ने कांशीराम के जीतेजी साल 1997 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अपनी पौलिसी की उलट सोच वाली भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन कर सरकार चलाने में न केवल समर्थन दिया, बल्कि खुद मुख्यमंत्री बनीं.

एक तरह से बसपा सुप्रीम मायावती ने उस समय दलित तबके का सौदा कर अपनी कुरसी हासिल की. भारतीय जनता पार्टी उस कट्टर पौराणिक हिंदू धर्म की हिमायती है, जो दलितों को पिछले जन्मों के कुकर्मों के लिए फल भोगने वाला मानता है और खुद को श्रेष्ठ पूजापाठी समझता है.

आज अगर उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी है, तो इस की सब से बड़ी वजह है कि बसपा सुप्रीम मायावती का राजनीति से बाहर होना. जिस तरह से पिछले 2 विधानसभा और लोकसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी राजनीतिक रूप से जानबू?ा कर निष्क्रिय रही है, उस को देख भारतीय जनता पार्टी ने दोनों हाथों से मौका लपकते हुए दलित समाज के वोट बैंक को अपनी तरफ खींचा है.

इसी तरह लोक जनशक्ति पार्टी, जिस का गठन केंद्रीय मंत्री रह चुके रामविलास पासवान ने साल 2000 में किया था, जो कि खुद पिछड़े दलित समाज से थे और बिहार में दलित तबके में इन की अच्छी पकड़ थी. इन्होंने भी कुरसी के लालच में कई जगह हाथपैर मारे.

साल 2009 के लोकसभा चुनाव में इन्होंने दलित तबके में अपनी अच्छी पकड़ को ले कर समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल के साथ बिहार की 40 और उत्तर प्रदेश की 80 सीट मिला कर 120 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिस में इन को बिहार में 12 सीटें दी गईं और यह गठबंधन पूरी तरह नाकाम हुआ और लोक जनशक्ति पार्टी अपनी सारी 12 सीटें हार गई.

इस के बाद अपने पिछड़े समाज के उसूलों और उन के हक की लड़ाई को पीछे छोड़ लोक जनशक्ति पार्टी ने नई नीति अपनाई और जीत की चाह में साल 2014 में चली मोदी की लहर के साथ हो गई. यह वही भारतीय जनता पार्टी थी, जो कभी केंद्र में कांग्रेस के समय मंत्री रहे रामविलास पासवान की नीतियों का विरोध करती थी.

लेकिन सत्ता के नशे में मोदी लहर में लोक जनशक्ति पार्टी भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल हो गई. जहां साल 2014 के लोकसभा में लोक जनशक्ति पार्टी को बिहार की 40 सीटों में से 7 सीटें दी गईं, जिस में से उस ने 6 सीटें भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से जीतीं.

इसी तरह निषाद पार्टी का गठन साल 2016 में हुआ था. इस पार्टी का गठन निषाद, केवट, बिंद, बेलदार, मल्लाह, साहनी, कश्यप, गोंड समेत तकरीबन 20 समुदायों के सशक्तीकरण के लिए किया गया था, जिन का पारंपरिक व्यवसाय नदियों पर केंद्रित था, जैसे नाविक या मछुआरे.

इस पार्टी के संस्थापक संजय निषाद, जो पहले बहुजन समाज पार्टी के साथ थे, वे खुद उस से अलग हुए और बोले कि इस नाविक और मछुआरे पिछड़े तबके की नुमाइंदगी के लिए एक अलग पार्टी की जरूरत थी, इसलिए इस का गठन किया गया.

लेकिन हुआ क्या, साल 2017 में वे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ खड़े हुए और बुरी तरह से हारे, जिस के बाद सत्ता की चाह में साल 2022 में भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन कर उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव लड़ा और 10 में से 6 सीटें जीतीं.

मतलब साफ है कि पहले अपने तबके के लोगों को अपने साथ लाओ, फिर अपनी कुरसी के लिए उन का सौदा कर दो.

इसी तरह अपना दल का भी यही हाल है. इस के संस्थापक सोनेलाल पटेल ने बहुजन समाज पार्टी से अलग हो कर अपना दल पार्टी का गठन किया. कुर्मी और ओबीसी समुदाय में पकड़ रखने का दावा करने वाले और खुद को पिछड़े समुदाय का रखवाला बताने वाले अपना दल ने भी साल 2014 में भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन कर लिया.

अपना दल की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल वर्तमान में सासंद हैं और केंद्र सरकार में शानोशौकत से स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री का पद संभाल रही हैं.

अगर इन सभी पार्टी के राजनीतिक इतिहास पर एक नजर डालें, तो साफ दिखता है कि इन्होंने अपना गठन तो इस तरह किया जैसे कि ये दलित तबकों की आवाज उठाने, उन को हक दिलाने के लिए सत्ता में आए हैं, लेकिन सचाई यह है कि बहुजन समाज पार्टी, लोक जनशक्ति पार्टी, निषाद पार्टी या अपना दल पार्टी इन सब ने अपनी कुरसी के लिए इस तबके का सौदा ही किया है. इन्होंने ही दलितों को बेचा है. पहले इन की आवाज बनने का नाटक करते हैं, फिर जैसे ही चुनाव में हार मिलती है, उस के तुरंत बाद अपनी विचारधारा से अलग पार्टी से गठबंधन कर लेते हैं.

यह समस्या केवल राजनीतिक पार्टी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह आम समाज में भी दिखती है, जहां खुद इस समाज से निकले कुछ बुद्धिमान लोग अपने ही समाज के लोगों को इकट्ठा करते हैं, उन के लिए सहारा बनते हैं, फिर वही लोग बाद में जा कर किसी राजनीतिक दल से जुड़ जाते हैं और अपने इस दलित तबके के लोगों को भी इस राजनीतिक पार्टी से जुड़ने के लिए कहते हैं.

चूंकि इस तबके के लिए बाबा साहब अंबेडकर अहम जगह रखते हैं, इसलिए हर बार चुनाव से पहले इन के गुणगान कर ‘बाबा साहब’ चिल्ला कर ये राजनीतिक पार्टियां इन के मन में यह बैठा देती हैं कि इस पिछड़े दलित तबके के लिए आवाज सिर्फ यही उठा सकते हैं. ये ही इन के मसीहा हैं, चाहे बहुजन समाज पार्टी हो, लोक जनशक्ति पार्टी हो या आजाद समाज पार्टी हो या फिर निषाद पार्टी. लेकिन इन सब के उलट होता कुछ नहीं.

इस पिछड़े दलित तबके की आवाज उठाने या उन को हक दिलाने के मकसद से आई इन पार्टियों ने अपने राज्यों में दलित समाज के लिए कितना काम किया है, उस का अंदाजा इसी से लग जाता है, जहां आरटीआई के जवाब में बताया गया कि अनुसूचित जाति के लोगों के साथ जोरजुल्म के मामलों में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के पास साल 2020-21 में 11,917, साल 2021-22 में 13,964, साल 2022-23 में 12,402 और साल 2024 में 9,550 शिकायतें मिलीं.

इस में से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून के तहत साल 2022 में 51,656 मामलों में से उत्तर प्रदेश में ही अकेले 12,287 मामले थे. इस के बाद राजस्थान में 8,651, मध्य प्रदेश में 7,732, बिहार में 6,799, ओडिशा में 3,576 और महाराष्ट्र में 2,706 मामले दर्ज किए गए थे. इन आंकड़ों से यह साफ जाहिर होता है कि आज भी इस तबके के खिलाफ जोरजुल्म जारी है.

ये आंकड़े तो वे हैं, जहां पिछड़े तबके के इन लोगों ने ऊंची जाति वालों के खिलाफ हिम्मत कर के शिकायत दर्ज कराई है.

पता नहीं, ऐसे कितने मामले गांवदेहात में यों ही ऊंची जाति वाले लोगों के दबाव में दबा दिए जाते हैं, जो कभी अनुसूचित जाति आयोग की दहलीज तक पहुंच ही नहीं पाए.

ऐसे मामलों में इन पिछड़े तबके के लोगों को अगर ये राजनीतिक दल या इन के नेता बस अनुसूचित जाति आयोग का दरवाजा ही दिखा दें, तब भी ये लोग इंसाफ पा सकते हैं.

इतना ही नहीं, साल 2013 में ‘हाथ से मैला ढोने की प्रथा का उन्मूलन’ कानून आ गया था, लेकिन इस के बावजूद पिछले 5 सालों में साल 2018 से साल 2023 के बीच हाथ से मैला ढोने के चलते 400 लोगों की मौत हुई है और ये 400 लोग किस तबके से ताल्लुक रखते थे, यह सब जानते हैं.

किसी ने भी इन की मजबूरी जानने की कोशिश नहीं की. आखिर कानून आने के बाद भी ये बिना किसी सेफ्टी इक्विपमैंट्स के नदीनालों में कैसे उतर जाते हैं.

दरअसल, कानूनन तो हाथ से मैला ढोने की कुप्रथा पूरी तरह बंद है, इस के बावजूद भी अगर कोई नदीनाला इतना संकरा होता है कि वहां मशीन का जाना मुमकिन ही नहीं है, तो वहां जिस महकमे ने इन्हें किसी नदीनाले की सफाई करने भेजा है, तो वहां उस महकमे के सीनियर अफसर की देखरेख में पूरी सेफ्टी इक्विपमैंट्स के साथ वह मुलाजिम उतरेगा, ऐसा नियम है. लेकिन सवाल यही उठता है कि इन सेफ्टी नियमों का पालन कौन करे और कौन कराए. अगर इन को कुछ हो जाए, तो इन की जान की कीमत ही क्या है.

अब पिछड़ेदलित तबके के ये लोग कोई स्किल तो जानते नहीं, बस हाथ का काम साफसफाई, गटर साफ करना वगैरह जानते हैं. आज भी हम दिल्ली जैसे शहरों में देखते हैं, जहां इस पिछड़े तबके से जुड़े लोग अपनी दिहाड़ी बनाने के लिए हाथ में एक बड़ा लंबा और पतला सा डंडा लिए घूमते रहते हैं और 100-200 रुपए के लिए कभी गटर में उतर जाते हैं, तो कभी अपने डंडे से गटर साफ करते हैं.

यहां पर जहां इन के उत्थान की जरूरत है, ऐसे समय पर सभी राजनीतिक दल गायब हो जाते हैं. सवाल यह उठता है कि इन के नाम पर बने राजनीतिक दल ने अपनेअपने राज्यों में इन के उत्थान के लिए क्या किया?

इस समाज की बड़ी परेशानी शराब, रीतिरिवाज, ?ाड़फूंक है, जिस के खिलाफ ये लोग खड़े होने को तैयार नहीं हैं. इस समाज ने सैकड़ों बाबा, फकीर पाल रखे हैं, जिन पर ये अपनी मेहनत की कमाई खर्च कर देते हैं.

एक तो यह तबका इतना पढ़ालिखा नहीं होता. दूसरा, जो इन के तबके में पढ़ालिखा होता है, वह खुद इन लोगों से दूरी बनाने लगता है. जो राजनीतिक दल इन के चहेते बनने की कोशिश करते हैं, वे खुद इन को जागरूक नहीं करते हैं, क्योंकि वह यह बात बखूबी जानते हैं कि जिस दिन यह तबका जागरूक हो गया, उस दिन इन के पीछे घूमना बंद कर देगा.

हालांकि, इस तबके की तरक्की और इन के पुनर्वास के लिए ‘नमस्ते’ योजना समेत राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर इतनी योजनाएं चलती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में कुछ नहीं दिखाई पड़ता.

जो पार्टियां चुनाव के समय इन से वोट मांगने आती हैं, अगर वे ही इन के कल्याण से जुड़ी व चलाई जा रही योजनाओं की जानकारी इन को दे दें, तो इन को हाथ से मैला ढोने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी.

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