Health. चिकनगुनिया अल्फा नामक वायरस से होने वाली बीमारी है, जो एडिस एजिप्टी नामक मादा मच्छर द्वारा काटने पर होती है. अल्फा वायरस टोगा वायरस परिवार का सदस्य है.

पहली बार साल 1953 में तंजानिया, अफ्रीका में बुखार से पीडि़त एक शख्स के खून से इस वायरस का पता चला था. यह महामारी की तरह अफ्रीका की हद को लांघता हुआ एशिया के तमाम देशों में फैल गया.

एडिस मादा मच्छर 5 मिलीमीटर लंबा, काले रंग का, ऊपर से सफेद पट्टियों वाला होता है. इसे टाइगर मच्छर के नाम से भी जाना जाता है.

इस मच्छर की जिंदगी महज 4 हफ्ते की होती है. यह अपने भोजन के लिए लोगों  का खून पीता है.

इस मच्छर के वायरस को पूरी तरह पनपने में 7 से 8 दिन लगते हैं. यह मच्छर दिन में काटना पसंद करता है. एक बार काटने पर एडिस मच्छर को 3 दिन की खुराक मिल जाती है. यह अपने थूक द्वारा चिकनगुनिया के वायरस को लोगों के शरीर में छोड़ देता है.

चिकनगुनिया नाम से ऐसा लगता है, जैसे यह कोई मुरगेमुरगियों में फैलने वाली बीमारी होगी, पर असलियत यह नहीं है.

चिकनगुनिया स्वाहिली भाषा का शब्द है, जिस का मतलब है दर्द से दोहरा हो जाना और चालढाल का टेढ़ा हो जाना. इस बीमारी में मरीज अपने जोड़ों के भयंकर दर्द को सह नहीं पाता है.

एडिस मच्छर का घर

एडिस मच्छर ज्यादातर घर के अंधेरे कोनों, नमी वाली जगहों, सोफे व पलंग वगैरह के नीचे, कपड़ों, परदों में छिपे रहते हैं. पानी भरे बरतनों, कूलरों, पानी की टंकियों, गमलों व घरों के बाहर जमा पानी में ये मच्छर अंडे दे कर अपनी तादाद बढ़ाते रहते हैं. इन मच्छरों के अंडे बिना पानी के भी एक साल तक सहीसलामत रह सकते हैं.

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