Hindi Short Story. गांव के बाहर एक पुराना बरगद का पेड़ था. उस की फैली शाखाएं दूरदूर तक छाया देती थीं. लोग कहते थे कि वह बरगद जितना पुराना है, उतनी ही पुरानी उस की कहानियां हैं.
उसी बरगद की ही तरह थे रामनारायणजी. 70 साल की उम्र में भी उन का दबदबा पूरे कसबे में था. लोग इज्जत से उन्हें ‘मास्टर साहब’ कहते थे. उन्होंने जिंदगीभर स्कूल में बच्चों को पढ़ाया था. पत्नी सरला के न रहने के बाद उन का संसार केवल एक इनसान तक सिमट गया था, उन की बेटी सृष्टि.
सृष्टि जब 5 साल की थी, तभी उस की मां चल बसी थीं. रामनारायणजी ने दूसरी शादी नहीं की. उन्होंने अपनी जिंदगी की हर इच्छा, हर शौक और हर सपना बेटी के लिए त्याग दिया. वे उस के लिए पिता भी बने, मां भी बने और दोस्त भी.
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सृष्टि बड़ी हुई. वह पढ़ने में तेज थी. शहर की यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर बन गई. वहीं उस की मुलाकात अभिषेक से हुई.
अभिषेक शांत स्वभाव का नौजवान था. दोनों ने ब्याह कर लिया. शादी के बाद सृष्टि शहर में बसना चाहती थी, लेकिन रामनारायणजी अकेले थे.
‘‘बेटा, मैं तुम्हें रोकना तो नहीं चाहता...’’ रामनारायणजी ने कहा, ‘‘लेकिन इस घर की दीवारें तुम्हारे बिना बहुत खाली हो जाएंगी.’’
सृष्टि रुक गई. अभिषेक ने भी कुछ नहीं कहा. वह जानता था कि सृष्टि अपने पिता से बेहद प्रेम करती है.
धीरेधीरे साल बीतते गए. घर में 2 बच्चे भी हो गए, आरव और अन्वी.
पर एक विचित्र बात होने लगी. घर में हर फैसले का केंद्र रामनारायणजी होते. बच्चे किस स्कूल में पढ़ेंगे? कहां घूमने जाएंगे? कौन सी कार खरीदी जाएगी? यहां तक कि सृष्टि कौन सा रिसर्च सब्जैक्ट चुनेगी? हर बात में आखिरी फैसला उन का होता.
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