Hindi Story. विशाल जानता था कि फैक्टरी की भलाई के लिए उस ने जो योजना बनाई है, उस के फेल हो जाने पर उस की बरबादी यकीनी है. पर उसे यह भी पता था कि बगैर खतरा उठाए कोई बड़ा काम भी नहीं किया जा सकता. उस ने सोचविचार कर कदम आगे बढ़ाया. क्या उसे कामयाबी मिली?
‘‘प्रमोदजी, 2 लाख रुपए बहुत होते हैं. मेरी हालत ऐसी नहीं है कि इतने रुपए दे सकूं,’’ सेठ दीनदयाल ने बेचारगी से कहा.
‘‘सेठजी, आप को भला रुपयों की क्या कमी?’’ मजदूर नेता प्रमोद धीरे से बोला.
‘‘आप तो जानते ही हैं कि पिछले 2 साल से मेरी फैक्टरी में घाटा हो रहा है. बस, किसी तरह दालरोटी चल रही है.’’
‘‘आप की दालरोटी दोनों चल रही है, वरना इस महंगाई के जमाने में दाल कितनों को मिल पाती है? बस, रोटी ही रोटी चल रही है. अगर आप जैसे सेठों की मेहरबानी बनी रहे, तो हम गरीबों के बच्चों को भी दाल मिल जाएगी, वरना वह दिन दूर नहीं जब थाली में घी की तरह 1-2 चम्मच दाल का छौंक लगा कर संतोष करना पड़ेगा,’’ प्रमोद नरम लहजे में बोला.
‘‘आप समझने की कोशिश करिए,’’ सेठ दीनदयाल के लड़के विशाल ने कहा. वह हाल ही में अमेरिका से पढ़ कर लौटा था.
‘‘सेठ साहब, हम यहां समझने नहीं, बल्कि समझाने आए हैं. अगर कल तक मुझे 2 लाख रुपए नहीं मिले, तो परसों से फैक्टरी बंद समझिए,’’ प्रमोद ने आवाज बदलते हुए चेतावनी दी और दफ्तर से बाहर निकल गया.
प्रमोद के जाने के बाद विशाल ने कहा, ‘‘पिताजी, इस बदमाश को रुपए देने की कोई जरूरत नहीं है.’’
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