Story in Hindi. उस इलाके में बहुत समय से एक पुलिस चौकी की जरूरत महसूस की जा रही थी. शहर की हद को छूती हुई एक नदी बहती थी, उसी पर नया पुल बना था. दिनभर उस पुल पर बसों, ट्रकों व कारों की रेलमपेल रहती, लेकिन शाम होते ही वहां वीरानी सी छा जाती. रात के अंधेरे में डूबा पुल खौफनाक वारदातों  का खामोश गवाह बन जाता था.

पुल पर आएदिन लूटमार की वारदातें होती रहतीं. पैदल या साइकिल सवारों को तो शाम होते ही लूट लिया जद्घाता. कई बार रात में ऐक्सिडैंट भी हो जाते और सवेरे कोई न कोई गाड़ी किसी खाई में पड़ी दिखाई देती.

उस पुल पर कई कत्ल हुए थे, इसलिए शहर की जनता के बीच वह इलाका ‘खूनी पुल’ के नाम से जाना जाता था.

कुछ लोगों का कहना था कि पुल पर किसी प्रेत का साया है. ऐसी बेसिरपैर की अफवाहों के चलते उसे ‘भुतहा पुल’ भी कहा जाने लगा था.

कुछ जानकार लोगों का कहना था कि पुल पर बदमाशों की हुकूमत चलती है. यह भी सच था कि थाना न होने के कारण बहुत सा गैरकानूनी माल ट्रकों द्वारा उस रास्ते से गुजरता था.

जब ज्यादा होहल्ला मचता, तो नजदीक के कसबे के थाने के 2 सिपाही दिन छिपे वहां आ कर खड़े हो जाते, मगर अंधेरा होते ही वे बेचारे भी वहां से खिसकने में ही अपनी भलाई समझते.

लेकिन जब वारदातें हद से ज्यादा बढ़ गईं और आम जनता बेहद परेशान हो गई, तो कोशिशें शुरू हुईं.

सब से पहले ड्राइवरों की यूनियन के नेताओं ने पुलिस के बड़े अफसरों के सामने अपनी परेशानी रखी. कुछ छुटभैए नेताओं ने भी दबाव डाला. शहर के सामाजिक संगठनों ने भी थोड़ीबहुत कोशिश की और रहीसही कसर अखबारों ने पूरी कर दी.

इस तरह न चाहते हुए भी पुलिस के आला अफसरों को इस दिशा में कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा, जिस का नतीजा भी जल्दी ही सामने आ गया.

पुलिस महकमे ने जनता की परेशानी को देखते हुए पुल पर बाकायदा एक चैक पोस्ट बना दी. जल्दी ही 2 बैरियर सड़क पर खड़े कर दिए गए और पुलिस का एक दस्ता तैनात कर दिया गया.

लेकिन चैक पोस्ट के पुलिस वाले बजाय जनता की सेवा करने के उलटे उसे लूटने लगे. चोर, डकैत तो केवल रात के समय ही लोगों को लूटते थे, मगर इन लोगों ने दिनदहाड़े डकैती डालनी शुरू कर दी.

पुलिस का वरदीधारी सिपाही अकसर बीड़ी पीता हुआ सड़क के किनारे खड़ा रहता. नजदीक ही सबइंस्पैक्टर मेज व कुरसी डाले रजिस्टर उलट रहा होता. बाकी स्टाफ या तो अखबार पढ़ता रहता या खाना बनाने में मशगूल होता.

एक दिन सिपाही ने सड़क पर सामने से आते ट्रक को बड़ी मुस्तैदी से रुकवाने की कोशिश की. फिर ड्राइवर की खिड़की के पास पहुंच कर आदत के मुताबिक डंडा मार कर पूछा, ‘‘क्यों बे, कहीं स्मगलिंग का माल तो नहीं ले जा रहा?’’

ड्राइवर हाथ जोड़ कर खीसें निपोरने लगा, तो सिपाही ने रोबदार आवाज में कहा, ‘‘गाड़ी के कागजात और अपना लाइसैंस निकाल कर साहब के पास चल.’’

ड्राइवर ने जेब में हाथ डाला, मानो लाइसैंस निकाल रहा हो. मगर जब उस का हाथ बाहर आया, तो उस में सौ का एक करारा नोट दबा था.

सिपाही ने नोट अपनी जेब के हवाले किया और ड्राइवर को गाड़ी चलाने का इशारा किया. अब माल की जांच करने की कोई जरूरत ही नहीं रह गई थी, फिर भले ही उस ट्रक में कुछ भी हो. उस चैक पोस्ट के पुलिस वाले आएदिन पैसे के बंटवारे को ले कर आपस में लड़ते झगड़ते देखे जाते.

वैसे अंदरूनी तौर पर उन में से कोई भी खुश नहीं था. सबइंस्पैक्टर का लड़का अस्पताल में भरती था. एक कांस्टेबल की बीवी बेहद बीमार थी. वह जो कमाता, उस के इलाज पर खर्च हो जाता.

किसी का बाप बीमार था, तो किसी की मां. कोई खुद ही मरीज था और ढेर सारी गोलियां जेबों में भरे फिरता. मतलब, घूसखोरी की कमाई अपना रंग दिखा रही थी.

ड्यूटी पर तैनात सिपाही आदत के मुताबिक हर गाड़ी वाले से कुछ न कुछ पैसा वसूलने की ताक में रहते. तरबूजों की गाड़ी आती, तो 2-3 तरबूजे उठा लिए जाते. अगर ककडि़यों  की गाड़ी उधर से गुजरती, तो सभी लोग ककडि़यों का मजा लेते नजर आते. खरबूजे की गाड़ी गुजरने पर 4-5 किलो खरबूजे ही मार लिए जाते. एक कांस्टेबल को तो घर के लिए एक ट्रक वाले से पक्का कोयला भी मांगते हुए देखा गया.

इन लोगों की करतूतें देख कर ऐसा लगता, जैसे उन्हें सरकार की ओर से लूटखसोट करने की खुली छूट दे दी गई हो.

आजाद भारत में वे कुछ भी मनमानी करने के लिए आजाद थे. कुल मिला कर जिस मकसद को ले कर चैक पोस्ट बनाई गई थी, वह बहुत पीछे छूट गया था.

वह खूनी पुल गवाह है कि वहां पहले भी राहजनी होती थी और अब भी होती है. हां, लुटेरों के चेहरे जरूर बदल गए हैं.

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