Story in Hindi. आज रामजी सिंह के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे, क्योंकि उन का बेटा मनोज विदेश से वकालत की डिगरी ले कर लौटने वाला था.

वे खुशी के मारे कुरसी छोड़ कर कमरे में चहलकदमी कर रहे थे कि तभी उन का नौकर जतिन कंधे पर एक बड़ा सा बैग लिए कमरे में घुसा. उस के पीछे मनोज भी था. उस ने झुक कर रामजी सिंह के पैर छुए.

रामजी सिंह ने मनोज को सीने से लगा लिया, फिर प्यार से बोले, ‘‘जब कोई बेटा अच्छा काम करता है, तो बाप का सिर गर्व से ऊपर उठ जाता है. आज तुम ने वही काम किया है.’’

‘‘यह सब आप के चरणों का प्रसाद है पिताजी,’’ मनोज ने कहा.

‘‘नहीं बेटा, यह तो स्वामी त्यागी बाबा की कृपा है, जिन्होंने तुम्हारी कामयाबी के लिए दिनरात एक कर के शंकर की पूजा की और उन से तुम्हारी कामयाबी की दुआ मांगी थी.

‘‘अब तुम पहले हाथमुंह धो कर कुछ खापी लो, फिर हम बाबा से आशीर्वाद लेने उन की मठिया चलेंगे.’’

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थोड़ी देर बाद रामजी सिंह सोने और चांदी के कुछ गहने ले कर मनोज के साथ त्यागी बाबा के दर्शन के लिए चल दिए.

हालांकि यह सब मनोज को अच्छा नहीं लग रहा था, फिर भी वह अपने पिताजी की बात रखने के लिए उन के साथ चल दिया.

त्यागी बाबा की मठिया का नजारा देख कर मनोज कुछ पलों के लिए हैरान रह गया. वह मठिया नाम की थी, क्योंकि उसे देखने से ऐसा लगता था जैसे वह किसी राजामहाराजा का बड़ी शान वाला महल हो. मंदिर का तो कहना ही क्या, वह संगमरमर से बनवाया गया था. उस के बगल में गंगा नदी बहती थी.

मनोज ने अपने पिता से पूछा, ‘‘यह राजामहाराजा जैसा बड़ी शान वाला महल और संगमरमर का मंदिर किस ने बनवाया है?’’

‘‘बेटा, यह मंदिर गांव वालों की मदद से बना है और मठिया, जिसे तुम बड़ी शान वाला महल समझ  रहे हो, को त्यागी बाबा ने राहगीरों से चंदा वसूल कर बनवाया है.’’

‘‘पिताजी, चंदा वसूल कर के इतनी शानदार मठिया बनवाना नामुमकिन है,’’ मनोज को पिता की बातों पर यकीन नहीं हो रहा था.

फिर वे दोनों त्यागी बाबा के पास पहुंचे. त्यागी बाबा की सफेद लंबीलंबी दाढ़ी और मूंछें थीं. उन के माथे पर चंदन का टीका और शरीर पर केसरिया रंग के कीमती कपड़े थे.

रामजी सिंह और मनोज को देखते ही त्यागी बाबा के होंठों पर मुसकान उभर आई. रामजी सिंह ने झुक कर उन के पैर छुए और एक थैला, जिस में सोनेचांदी के गहने व कुछ रुपए थे, उन्हें थमा दिया.

थैला देखते ही बाबा की आंखों में चमक आ गई.

‘‘मनोज, मेरे करीब बैठो,’’ त्यागी बाबा ने कहा. मनोज उन के करीब जा कर बैठ गया.

त्यागी बाबा ने रामजी सिंह से कहा, ‘‘तुम्हारी मनोकामना शंकर ने पूरी कर दी है. अब तुम जल्दी से उन का मंदिर बनवा कर उन्हें भी खुश कर दो. उन की खुशी से ही तुम्हारी तरक्की होगी.’’

‘‘महाराज, इसीलिए तो मैं मनोज को अपने साथ लाया, ताकि इस के हाथों से मंदिर की नींव रखी जा सके.’’

‘‘हां, तुम ने यही बात शंकर की मूर्ति के सामने उस दिन भी कही थी, जब मनोज वकालत की पढ़ाई करने विदेश जा रहा था.’’ ‘‘मंदिर की नींव रखने का दिन कब शुभ होगा?’’ रामजी सिंह ने पूछा.

त्यागी बाबा ने बताया कि कल ही मंदिर की नींव रखने का शुभ दिन है.

मनोज को मंदिर के बनाने की बात अच्छी नहीं लगी, क्योंकि वह नए विचारों का था. वह देवीदेवताओं में विश्वास नहीं रखता था.

मनोज ने अपने पिताजी से कहा, ‘‘पिताजी, आप ने त्यागी बाबा को गहने और रुपए दे कर ठीक नहीं किया. दान तो उसे देना चाहिए, जो जरूरतमंद हो.’’ ‘‘साधुमहात्मा को दान करने से पुण्य और सुख मिलता है,’’ पिता ने कहा.

‘‘नहीं पिताजी, ये सब त्यागी बाबा के ढकोसले हैं… इनसान जैसा काम करता है, वैसा ही बनता है. देवीदेवताओं और महात्माओं को दान देने से कोई कुछ नहीं बनता.’’

रामजी सिंह सब बरदाश्त कर सकते थे, लेकिन देवीदेवताओं और महात्माओं की बेइज्जती हरगिज नहीं.

वे गुस्सा हो गए और चिल्लाए, ‘‘बेवकूफ, विदेश जा कर तेरा दिमाग खराब हो गया है…जिन देवीदेवताओं की वजह से तू वकालत की डिगरी ले कर आया है, उन्हें ही बेइज्जत कर रहा है. अगर उन की कृपा न होती, तो तू कब का फेल हो गया होता.’’

पिताजी को गुस्से में देख कर मनोज ने आगे कुछ बोलना ठीक नहीं समझा.

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अगले दिन रामजी सिंह, मनोज, जतिन और पड़ोस के कुछ लोग मंदिर की नींव रखने जाने को तैयार थे, तभी फोन आया कि रामजी सिंह की बहिन शहर के अस्पताल में आखिरी सांसें गिन रही हैं.

उन्होंने मनोज को 20 हजार रुपए देते हुए कहा, ‘‘मैं शहर जा रहा हूं. तुम त्यागी बाबा के कहे मुताबिक ही मंदिर की नींव रख आना…’’

मनोज का मन मंदिर बनाने के हक में बिलकुल नहीं था, पर पिताजी की बात रखने के लिए उसे जाना पड़ रहा था. अभी वह कार के पास पहुंच भी नहीं पाया था कि किसी के गिड़गिड़ाने की आवाज सुनाई पड़ी. उस ने पलट कर देखा तो पाया कि उस के गांव का एक लकड़हारा बुरी तरह घबराया हुआ था.

‘‘बड़े साहब कहां हैं?’’ लकड़हारे के चेहरे पर घबराहट साफ दिख रही थी. ‘‘वे तो शहर गए हैं,’’ कहते हुए मनोज की आंखें हैरानी से फैल गईं, ‘‘क्या बात है?’’

‘‘मेरे छोटे भाई को बचा लो छोटे साहब,’’ कह कर लकड़हारे ने मनोज के पैर पकड़ लिए. ‘‘क्या बात है?’’ मनोज ने दोबारा पूछा.

‘‘छोटे साहब, हम दोनों भाई जंगल में लकड़ी काटने गए थे. अचानक भाई का पैर फिसल गया और वह पेड़ से नीचे गिर पड़ा. उस की एक टांग टूट गई है. मुझे 10 हजार रुपए की जरूरत है.’’

मनोज को उस लकड़हारे पर दया आ गई. उस ने जतिन को हुक्म दिया, ‘‘मंदिर की नींव के रुपयों में से 10 हजार रुपए इसे दे दो.’’ जतिन ने पूछा, ‘‘इसे 10 हजार रुपए देने से मंदिर की नींव कैसे रखी जाएगी?’’

‘‘मेरा हुक्म मानो,’’ मनोज गुस्सा हो गया. जतिन डर से कांप गया. उस ने तुरंत लकड़हारे को 10 हजार रुपए दे दिए. ‘‘अब मंदिर की नींव कैसे रखेंगे छोटे साहब?’’ जतिन ने दोबारा पूछा.

‘‘मंदिर की नींव रखने से ज्यादा जरूरी था उस लकड़हारे के भाई के इलाज के लिए 10 हजार रुपए देना.’’ ‘‘लेकिन वह लकड़हारा 10 हजार रुपए कहां से लौटाएगा?’’

‘‘किसी इनसान पर किए गए एहसान का बदला वह किस रूप में चुका दे, कोई नहीं जानता… तुम जा कर अपना काम करो. आज मंदिर की नींव नहीं रखी जाएगी.’’

जब रामजी सिंह शहर से वापस लौटे, तो सारी बात जान कर गुस्से से कांप उठे. उन्हें पूरी उम्मीद थी कि मंदिर की नींव रख दी गई होगी, लेकिन नींव की बात तो दूर 10 हजार रुपए भी हाथ से निकल गए थे.

‘‘दुष्ट, तू ने मंदिर की नींव न रख कर बहुत बड़ा पाप किया है. धर्म के काम के रुपए एक लकड़हारे के इलाज के लिए दे दिए. शंकर तुझे कभी माफ नहीं करेंगे…’’ रामजी सिंह गुस्से में बोले.

‘‘पिताजी इनसान ही इनसान की मदद करता है, देवीदेवता नहीं. अगर वह लकड़हारा पैसा ले गया है, तो जरूर वापस दे देगा.’’

मनोज की बात सुन कर रामजी सिंह समझ  नहीं पा रहे थे कि अपने बेटे को कैसे समझाएं. वे खीज कर वहां से त्यागी बाबा के पास चले गए और मनोज की सारी करतूतों के लिए उन से माफी मांगी.

त्यागी बाबा ने कहा, ‘‘मनोज ने ऐसा कर के बहुत बड़ा पाप किया है, क्योंकि मंदिर का बनना धर्म का सब से बड़ा काम होता है. खैर, तुम इस की चिंता मत करो. मैं शंकर से विनती करूंगा कि वे मनोज को माफ कर दें… तुम एक महीने के अंदर रुपयों का इंतजाम कर के मंदिर की नींव रखवा दो.

‘‘जब रुपए का इंतजाम हो जाए, तो तुम मनोज को ले कर चुपचाप मेरे पास चले आना. इस बात का खयाल रहे कि मनोज के साथसाथ किसी को भी यह पता न लगे कि तुम उसे यहां ले कर आए हो.’’ ‘‘जैसी आप की आज्ञा.’’

एक महीने के अंदर ही रामजी सिंह ने 20 हजार रुपए का इंतजाम कर लिया और चुपचाप मनोज को त्यागी बाबा के पास ले आए.

‘‘इसे तहखाने में ले चलो, वहीं इसे शास्त्र का ज्ञान देना होगा. तभी यह देवीदेवताओं पर भरोसा करेगा,’’ कह कर त्यागी बाबा एक तरफ चल दिए. उन के पीछे रामजी सिंह और मनोज भी चल दिए.

त्यागी बाबा उन दोनों को एक ऐसे घर में ले गए, जो गंगा नदी के किनारे था. उस घर में चारों तरफ मोटीमोटी किताबें रखी थीं. त्यागी बाबा ने दोनों को एक चटाई पर बैठाया.

रामजी सिंह ने बैग, जिस में 20 हजार रुपए रखे थे, एक तरफ रख दिया. त्यागी बाबा ने वह बैग उठा लिया.

अचानक कमरे में 2 साधु घुसे. उन्होंने दरवाजे बंद कर दिए. उन के हाथों में कोड़े थे. उन्हें देखते ही त्यागी बाबा के होंठों पर छल भरी मुसकान नाच उठी. वे बोले, ‘‘इन दोनों को कोड़ों से इतनी मार मारो कि बेहोश हो जाएं, फिर इन्हें गंगा में फेंक देना.’’

त्यागी बाबा की यह बात सुन कर रामजी सिंह और मनोज डर से कांप उठे. ‘‘यह क्या महाराज?’’ रामजी सिंह कांपती आवाज में बोले. दोनों साधु रामजी सिंह और मनोज के बदन पर कोड़े बरसाने लगे. दोनों बापबेटा जमीन पर गिर कर तड़पने लगे.

तभी धड़ाम से दरवाजा खुला और 2 आदमी अंदर घुस आए. पहले आदमी के हाथों में लकड़ी का मोटा डंडा था, दूसरा बैसाखियों के सहारे चल रहा था.

पहले ने त्यागी बाबा के सिर पर जोर से डंडे से वार किया, तो वे नीचे गिर पड़े. अगले ही पल उस ने जोर से छलांग लगा कर दोनों साधुओं के सिर पर बारीबारी से डंडे से वार किया, तो वे भी बेहोश हो कर गिर पड़े.

‘‘आप लोग कौन हैं?’’ रामजी सिंह ने पूछा. ‘‘पिताजी, यह वही लकड़हारा है, जिसे मैं ने 10 हजार रुपए दिए थे. यह लंगड़ा आदमी इस का भाई है. इस की टांग के इलाज के लिए ही मैं ने रुपए दिए थे.’’

‘‘इन ढोंगियों को हम अच्छी तरह से जानते हैं बड़े साहब, लेकिन किसी से कहते नहीं थे, क्योंकि कोई भी हमारी बात पर यकीन नहीं करता.’’

‘‘मान गए बेटा,’’ रामजी सिंह बोले, ‘‘अगर ये दोनों नहीं आते, तो हमें देवीदेवता भी नहीं बचा पाते. इनसान ही इनसान की मदद करे, यही सब से बड़ा धर्म है. चलो, पुलिस को खबर करें.’’

–अशोक कुमार

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