Caste Discrimination. साल 2016 से पहले टीना डाबी नाम की लड़की को कोई नहीं जानता था. वे एक दलित परिवार से ताल्लुक रखती थीं. पढ़ने में बहुत होशियार थीं. उन्होंने यूपीएससी की तैयारी की और 2015 की अपनी पहली ही कोशिश में आल इंडिया टौप किया और ट्रेनिंग के बाद साल 2016 के बैच की आईएएस अफसर बनीं.
यहां टीना डाबी का जिक्र इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि भारत में आज भी जाति का सांप नौजवान पीढ़ी खासकर लड़कियों को डंसने के लिए हमेशा तैयार रहता है. उन्हें ताना दिया जाता है चूंकि वे निचली जाति की हैं तो उन्हें पढ़लिख कर क्या हासिल होगा? घर वाले ही सवाल खड़ा कर देते हैं कि ‘तेरा क्या कालेज जा कर पढ़ने का काम?’, ‘अगर कमाने लगेगी तो तेरे नखरे बढ़ जाएंगे’, ‘हमारी बिरादरी में शादी नहीं हो पाएगी’. कहने का मतलब है कि उन के सपनों की उड़ान के पर काट दिए जाते हैं.
पर क्या जाति का हमारे दिलोदिमाग पर हावी होना इतना जरूरी है कि हम इस की बुनियाद पर किए गए फर्क को ही हकीकत मान लें और अपनी पूरी जिंदगी को बरबाद कर दें?
बिलकुल नहीं, क्योंकि जाति इनसान की काबिलीयत तय नहीं करती, बल्कि उस का काम और सोच तय करती है. टीना डाबी इस बात का सब से शानदार उदाहरण हैं.
अब सवाल उठता है कि जाति का यह भेद बनावटी क्यों है? जवाब, क्योंकि पैदा होते ही कोई ऊंचानीचा नहीं होता. पढ़ाई, हुनर, मेहनत, बरताव... यही इनसान की असली पहचान है. आज डाक्टर, इंजीनियर, टीचर, बिजनैसमैन हर जाति में हैं, तो फिर भेद का लौजिक ही खत्म हो जाता है.
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