Hindi Short Story. लक्ष्मी यह सोच कर अपनी झोंपड़ी में घुसी थी कि आज मांगीलाल से उस की मुठभेड़ न होगी, क्योंकि इस समय वह अपने यारदोस्तों के साथ मिल कर अड्डे पर दारू पी रहा होगा.

लक्ष्मी जिन घरों में बरतन मांजने का काम करती है, वह पौश कालोनी कहलाती है. आज मेम साहब ने उसे पैसे दिए हैं, जो छोटे से बटुए में रखे हैं. मगर जैसे ही वह झोंपड़ी के भीतर घुसी, मांगीलाल उसी का इंतजार कर रहा था.

धीरे से, मगर बड़े प्यार से वह बोला, ‘‘आ गई लक्ष्मी.’’ ‘‘हां आ गई, मगर आज तू यारदोस्तों में बैठ कर दारू नहीं पी रहा है?’’

‘‘पीऊंगा, जरूर पीऊंगा. आज तो मेम साहब से तू पगार लाई होगी…’’ ‘‘आज मेम साहब ने पैसे नहीं दिए,’’ वह तुरंत झूठ बोल गई.

‘‘झूठ मत बोल लक्ष्मी, मैं सब समझता हूं.’’ ‘‘क्या समझता है?’’ वह नाराजगी भरे लहजे में बोली.

‘‘तू झूठ बोल रही है. तू मेम साहब से जरूर पैसा ले कर आई है.’’ ‘‘तो सारा पैसा तुझ जैसे निखट्टू को दारू पीने को दे दूं क्या?’’ ‘‘ऐ लक्ष्मी, गाली मत बक… मैं तेरा सात फेरों वाला खसम हूं.’’

‘‘हां… हां, तू मेरा सात फेरों वाला खसम है, मगर कमा कर खिलाता है मुझे… उलटे, मैं तुझे और तेरी औलादों को खिला रही हूं. तेरा तो एक ही काम है, जोरू की कमाई की दारू पीना.’’ ‘‘हांहां पीता हूं. दारू तो तेरी सौतन लगती है न. ला, निकाल कर दे सौ का एक नोट.’’

‘‘नहीं दूंगी. दारू पीने का इतना ही शौक है, तो अपनी कमाई से पी.’’ ‘‘ऐ लक्ष्मी, जबान संभाल कर बोल. तेरी कमाई पर भी मेरा पूरा हक है. समझी… ला, निकाल.’’ ‘‘नहीं दूंगी… नहीं दूंगी,’’ कह कर लक्ष्मी चिल्ला पड़ी.

‘‘नहीं देगी?’’ ‘‘हांहां, नहीं दूंगी.’’ ‘‘कैसे नहीं देगी तू…’’ यह कह कर  मांगीलाल ने आगे बढ़ कर उस की चोटी पकड़ी. वह छटपटाई, मगर उस की मजबूत पकड़ के आगे वह मजबूर हो गई.

मांगीलाल ने उस के ब्लाउज के भीतर अपना हाथ डाला और बटुआ निकाल लिया. बटुए में से सौ का एक नोट निकाल कर वह हंसता हुआ बाहर निकल गया.

इस लड़ाई में लक्ष्मी का 2 साल का लड़का नींद से उठ गया और रोने लगा. उसे धौल जमाती हुई वह बोली, ‘‘इस को भी अभी उठना था. ले मर…’’  लक्ष्मी ने ब्लाउज को उठाया और अपनी छाती लड़के के मुंह में ठूंस दी. दूध पीते ही लड़का चुप हो गया.

लक्ष्मी पुरानी यादों में खो गई. झुग्गीझोंपड़ी में जन्म लेने वाली लक्ष्मी दयाराम की चौथी बेटी थी. उस का बाप दारू के नशे में धुत्त रहा करता था. मां दुखी रहा करती थी. उस ने यह सब देखा था.

एकएक कर के लक्ष्मी की तीनों बहिनों की शादी हो गई, तब तक तो वह भी जवानी में कदम रख चुकी थी. बस्ती के कई आवारा लड़कों ने उसे देख कर लार टपकाई.

एक दिन लक्ष्मी की मां ने गुस्से में आ कर उस के बाप से पूछा, ‘तुम को दारू पीने से फुरसत मिलती है क्या?’ ‘तुम कहना क्या चाहती हो?’ दारू के नशे में बाप ने पूछा.

‘लक्ष्मी बड़ी हो गई है…’ मां ने गुस्से से कहा, ‘इस की शादी करने की तुम्हें चिंता है भी या नहीं?’ ‘मेरी उम्र लड़कियों की शादी करतेकरते ही बीती है.’

‘तो क्यों पैदा की इतनी लड़कियां?’ मां ने कहा. तब बाप को गुस्सा आ गया. वह बोला, ‘लड़कियां पैदा करना क्या मेरे बस में था?’ ‘जब बस में नहीं था, तब लक्ष्मी की भी शादी जल्दी से कर दो, वरना यह हाथ से निकल जाएगी.’

यह सुन कर बाप को भी भीतर कुछ लगा, इसलिए लक्ष्मी के लिए भी जातबिरादरी में लड़के की खोज शुरू कर दी गई.

आखिरकार लक्ष्मी के बाप ने भी उस के लिए मांगीलाल नाम के एक लड़के को ढूंढ़ ही लिया. उसे मांगीलाल ने दारू में पटा लिया. लक्ष्मी ने चुपचाप शादी कर ली. मांगीलाल के मांबाप बचपन में ही गुजर गए थे. बड़े भाई ने उसे पालापोसा, फिर बाहर निकाल दिया.

शादी के थोड़े दिनों तक मांगीलाल उस पर प्यार लुटाता रहा, पर तीसरी औलाद आतेआते वह प्यार हवा हो गया. वह जो कमाता, दारू में ही उड़ाने लगा. लक्ष्मी उस की खिलाफत करती, तो मारनेपीटने लगा. कभीकभार तो भूखा रहने की नौबत आ जाती, तब वह भी बस्ती की दूसरी औरतों के साथ मजदूरी के लिए घर से निकल पड़ती.

मगर मजदूरी करते हुए लक्ष्मी ने जाना कि मर्द भेडि़या होता है. यहां भी उस की खूबसूरती लोगों को खल गई. सभी उस की देह से खेलना चाहते थे.

एक दिन लार टपकाते हुए ठेकेदार बोला, ‘लक्ष्मी, तुम तो हीरा हो हीरा… कहां उस मांगीलाल के साथ रहती हो.’ ‘क्या करूं ठेकेदार साहब, मेरी किस्मत में मांगीलाल ही लिखा था.’

‘उसे छोड़ क्यों नहीं देती हो?’ ‘नहीं ठेकेदार साहब, उसे कैसे छोड़ सकती हूं. वह मेरा सात फेरों वाला मेरा मर्द है.’ ‘ऐसा मर्द किस काम का, जो अपनी जोरू से मजदूरी करा रहा है?’

‘यह सब मेरे नसीब का खेल है ठेकेदार साहब.’ ‘मैं तेरा नसीब बदल सकता हूं.’ ‘कैसे?’ ‘मांगीलाल को छोड़ कर मेरे घर में बैठ जा. राज करेगी… फिर मजदूरी नहीं करनी पड़ेगी.’

‘नहीं ठेकेदार साहब, यह नहीं होगा. मांगीलाल जैसा भी है, आखिर है तो मेरा मर्द,’ कह कर उस दिन लक्ष्मी ने ठेकेदार से  पीछा तो छुड़ा लिया, मगर इस के बाद उसे काम से निकाल दिया गया.

मांगीलाल को यह सब नागवार गुजरा. वह गुस्से से बोला, ‘उस ठेकेदार के यहां काम पर जाना क्यों बंद कर दिया?’ ‘मेरी मरजी.’ मांगीलाल डांटते हुए बोला, ‘कल चली जाना.’ ‘नहीं जाऊंगी?’ ‘क्यों नहीं जाएगी?’ ‘उस की नीयत खराब है.’

‘वह तुझे खा जाएगा क्या?’ गाल पर चांटा रसीद करते हुए वह बोला, ‘कल से तू वहां जाएगी, समझी?’ ‘नहीं जाऊंगी,’ मार खाने के बावजूद वह बोली, ‘‘औरत को देख कर वह भेडि़या बन जाता है. मुझे उस के यहां काम नहीं करना.’’

‘तो तू कौन सी सती सावित्री है. चुपचाप चली जाना… उस ने मेरे पास खबर भिजवाई है,’ मांगीलाल हक से बोला.

दोबारा मना करने पर मांगीलाल ने उस की लातों से सेवा कर दी. उस समय वह भेडि़या बन गया था. लक्ष्मी ने उस की मार खा ली, पर उस ठेकेदार के यहां काम करने नहीं गई.

मांगीलाल को ठेकेदार ने दारू पिला कर अपने वश में कर लिया था, इसलिए वह ठेकेदार की तरफदारी कर रहा था. इस के बाद से लक्ष्मी ने मेम साहब के यहां बरतन मांजना, कपड़े धोना, झाड़ू बुहारना शुरू कर दिया.

आज 2 साल से वह उन बंगले वाली मेम साहब के यहां काम कर के सुखी है. जितना वह मजदूरी में कमा लेती थी, उतना ही वह मेम साहब के यहां भी कमा लेती है.

लक्ष्मी यादों से लौट आई. उस ने देखा कि वही ठेकेदार उस की झोंपड़ी में आ गया. वह भीतर ही भीतर कांप उठी. आखिर यह इतने दिनों बाद क्या लेने आया है?

तभी ठेकेदार बोला, ‘‘लक्ष्मी…’’ ‘‘क्या लेने आए हो?’’ ‘‘तुम्हें लेने आया हूं लक्ष्मी.’’ ‘‘मुझे,’’ लक्ष्मी हैरानी से बोली. ‘‘हांहां, तुम्हें.’’ ‘‘जाओ साहब, मैं किसी और की बीवी हूं.’’

‘‘वह तो मैं भी जानता हूं, मगर मांगीलाल ने तुम्हें बेच दिया है,’’ ठेकेदार ने यह बात कही, तो लक्ष्मी भीतर तक कांप उठी.

ठेकेदार आगे बोला, ‘‘यकीन न हो तो देख यह कागज, जिस पर मांगीलाल ने लिख कर दे दिया.’’ ‘‘अरे, उस ने दारू के नशे में सब लिख कर दे दिया होगा. उसे तो दारू पीने के लिए पैसा चाहिए, चाहे कहीं से भी मिले… हरामी इतना गिर गया.’’

‘‘गाली देने से कुछ न होगा लक्ष्मी. फिर उस ने भी आज तक कौन सा सुख दिया है तुझे? दारू पी कर तुझे मारनापीटना और तुझ से पैसे छीन कर दारू पीना, यही तो काम था उस का. उसे तुझे खिलाना चाहिए, पर तू उसे खिला रही है. मैं तुझे रानी बना कर रखूंगा. बैठ जा मेरे घर में.’’

‘ठेकेदार कहता तो सच है…’ लक्ष्मी ने मन ही मन सोचा, ‘मेरे बाप ने भी मां को क्या दिया? मेरी शादी मांगीलाल जैसे निखट्टू के साथ कर के बाप का फर्ज पूरा कर लिया, मगर कभी अपना प्यार दिया?

‘मांगीलाल ने मुझे कभी पति सा प्यार दिया? मेरी जिंदगी तो वैसे भी नरक बनी हुई है. वह आदमी के नाम पर भेडि़या है. जब चाहे आ कर मसल देता है. बैठ जाऊं ठेकेदार के यहां? कम से कम सुख से तो रहूंगी.

‘मांगीलाल से तो यह ठेकेदार अच्छा रखेगा. मगर मांगीलाल तो मेरा सात फेरों वाला पति है. वहां ठेकेदार की रखैल बन कर रहूंगी.

‘वैसे भी तो मैं मांगीलाल की रखैल बन कर रह रही हूं. कब तक मैं पत्नी का बंधन गले में लटका कर मांगीलाल की सती सावित्री होने का ढिंढोरा पीटती रहूंगी. आजकल क्या मान और क्या मर्यादा? थोड़े दिन लोग चिल्ला लेंगे, फिर चुप हो जाएंगे.’

ठेकेदार दोबारा बोला, ‘‘क्या सोच रही है लक्ष्मी?’’ ‘‘चल, मैं तेरे साथ रहूंगी. पत्नी बना कर रख या रखैल बना कर, मुझे क्या फर्क पड़ता है. मुझे सब मंजूर है,’’ लक्ष्मी के फैसले को सुन कर ठेकेदार का चेहरा खुशी से खिल उठा.

लक्ष्मी ने अपने सोए हुए बच्चे को उठाया और ठेकेदार के साथ अंधेरे में ही बस्ती से चल दी. Hindi Short Story

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