Historical Short Story. ईरान के एक कसबे खुरासान की छोटी सी गली के टूटेफूटे मकान में एक दर्जी रहता था. उस का नाम था इमाम कुली. जानवरों की खाल के लंबे चोगे और टोपियां बना कर वह अपना पेट भरता था. जो कुछ मिलता, उसी में उसे संतोष था.

इमाम कुली का 12 साल का बेटा था नादिर. बाप के साथ सिलाई में वह भी हाथ बंटाता था. वह अपनी खस्ता हालत से बहुत दुखी रहता था. अपने सारे दुखों के लिए वह दुनिया को कुसूरवार मानता था, इसलिए वह सारी दुनिया से नाराज था. उस का बस चलता तो वह दुनिया को जला कर राख कर देता.

एक रात को 2 बजे जब बापबेटे काम कर रहे थे, अचानक कुछ घुड़सवार खुरासान में आए. अपनी तलवारों की नाक पर उन्होंने खूब लूटपाट मचाई और कसबे से कई लोगों को वे गुलाम बना कर ले गए. नादिर भी उन में से एक था. 4 साल तक उज्बेकी डाकुओं की गुलामी में रह कर उस ने बहुत तकलीफें उठाईं.

इस के बाद वह खुद कुछ लोगों को इकट्ठा कर डाकू बन बैठा और ईरान में दूरदूर तक उस ने लूटपाट मचा दी. बेचारा इमाम कुली बदनामी के सदमे से चल बसा.

उन्हीं दिनों अफगानिस्तान ने अचानक चढ़ाई कर ईरान के अब्बास खानदान के कमजोर सुलतान को हरा दिया. शाह की शिकस्त के बाद 7 सालों में ईरान पर जबरदस्त जुल्म ढाए गए.

नादिर को गुलामी से अब सख्त नफरत थी. उस ने अफगानिस्तान के खिलाफ लोगों को ललकारा, देशवासियों में उस ने आजादी के लिए प्राण फूंके. ईरान उस के इशारों पर जाग उठा.

नादिर कुली ने न सिर्फ अफगानिस्तान, बल्कि रूस के कुछ हिस्सों, तुर्की यहां तक कि हिंदुस्तान के पेशावर और वजीराबाद शहरों पर भी कब्जा कर लिया. अब नादिर ईरान का सब से ताकतवर इनसान था.

बचपन से ही नादिर ने हिंदुस्तान की खुशहाली और बेशुमार दौलत की कई कहानियां सुनी थीं. सोने की इस चिडि़या पर कब्जा जमाने की उस की मंसा थी. दिल्ली के तख्त पर उन दिनों एक कमजोर और रंगीला बादशाह मुहम्मद बैठा हुआ था. वह रातदिन शराब और शबाब में डूबा रहता था. नाचगाने से उसे गहरा लगाव था. राजपूत उस से नाराज थे और मराठे उस की परवाह नहीं करते थे.

एक लाख, 60 हजार सैनिकों के साथ नादिर ने हिंदुस्तान पर धावा बोल दिया. दिल्ली के ‘तख्ते ताऊस’ पर उस ने कब्जा जमा लिया. रंगीले मुहम्मद बादशाह ने सारा खजाना नादिर के कदमों में डाल दिया.

‘‘सलाम हुजूर…’’ दीवाने खास की दीवारों और दिल्ली के मशहूर तख्त की खूबसूरती को हाथों से टटोलते नादिर कुली ने रस भरे बोल सुन कर उस ओर देखा कि एक बहुत ही खूबसूरत लड़की उस के आगे सिर झुकाए खड़ी थी. ऐसा हुस्न नादिर ने कहीं नहीं देखा था. उस ने पूछा, ‘‘कौन हो तुम?’’

‘‘मेरा नाम नूर है आलीजहां. मुझे आप की खिदमत के लिए बादशाह सलामत ने भेजा है. मैं आप के लिए यह तोहफा भी लाई हूं,’’ उस लड़की ने दुनिया का सब से कीमती कोहिनूर हीरा पेश कर दिया. पर नादिर की निगाहें तो नूर पर टिकी हुई थीं. वह बोला, ‘‘हमें इस की नहीं, तुम्हारी जरूरत है. मेरा कोहिनूर तो तुम हो.’’

‘‘हाय, मैं आप पर कुरबान,’’ नूरबाई ने अपनी नाजुक बांहें नादिर कुली के गले में डाल दीं. कोहिनूर को नादिर ने अपनी पगड़ी में खोंस लिया था.

4 घंटे बाद खर्राटे भरते नादिर को छोड़ कर नूर ने रंगीले बादशाह को कहलवाया, ‘‘अब आप चैन की बंसी बजाइए. आप का दुश्मन मेरी मुट्ठी में है.’’

यह सुन कर वह खिल उठा. उस ने खून का कतरा बहाए बिना ईरान के डाकू को जीत लिया था.

पर उसी रात को अफवाह फैल गई कि नादिर को किसी ने मार डाला है. 3 हजार ईरानी सैनिकों को तभी खत्म कर दिया गया.

नादिर ने यह सुन कर सिपहसालारों से कहा, ‘‘कोई बात नहीं, हिंदुस्तान की खातिर 3 हजार सिपाही हम ने कुरबान किए.’’

पर जब दूसरे और तीसरे दिन भी ईरानी सिपाही मारे जाते रहे, तो बगल में नूरबाई को थामे नादिर ने दिल्ली के लाल किले की छत से नंगी तलवार चलाते हुए चिल्ला कर कहा, ‘‘बदला…’’

फिर तो दिल्ली की सड़कों और गलियों में 5 घंटों तक औरतों, बच्चों और आदमियों का कत्लेआम होता रहा. करीब 20 हजार लोग कत्ल कर दिए गए.

‘‘रहम कीजिए, मेरे मालिक,’’ नूर नादिर के पैरों पर लोट गई. तुरंत कत्लेआम रोक दिया गया. नादिर नूर की गोद में सिर रख कर लेट गया.

‘‘शाहे आलम, क्या मुझे अपना वतन नहीं दिखाएंगे?’’ नूर ने कहा. ‘‘तुम चलोगी हमारे साथ?’’ खुशी से नादिर ने पूछा.

‘‘मैं आप की गुलाम हूं मालिक…’’ ‘‘हमें इस लफ्ज से गहरी चिढ़ है, तुम तो हमारी दिलेजाना हो,’’ नादिर ने फौज को वापस कूच का हुक्म दिया.

उस दिन से नादिर ने नूरबाई को हमेशा अपने साए की तरह साथ रखा. नूर की खूबसूरती, उस की भोली अदाओं पर वह जालिम डाकू जीजान से कुरबान था. अगले कई सालों तक नादिर कई देशों में खून की होली खेलता रहा. लोग उस के नाम से कांपने लगे थे.

एक दोपहर को खुरासान के महल में नूरबाई के दरवाजे पर एक पठान ने दस्तक दी, ‘‘बेगम हुजूर, आखिर आज हमें कामयाबी मिल ही गई.’’

‘‘सच?’’ नूरबाई के चेहरे पर रौनक नाच उठी. ‘‘जी हां, आप की कुरबानी आज रंग लाई है. मैं ने उसी खंजर से अपने और आप के वतन के दुश्मन नादिर शाह का काम तमाम कर दिया है.’’

‘‘तुम्हारा इनाम यही है कि आज से सिर से पैर तक मैं सिर्फ तुम्हारी हूं. जैसा भी तुम चाहो…’’ नूर ने हौले से कहा.

‘‘नहीं बेगम हुजूर, ऐसा कह कर मुझे छोटा मत बनाइए. मैं आप की बहुत इज्जत करता हूं. लोगों को मैं ने वतन के लिए सिर्फ एक बार मरते देखा है, पर आप तो उस दरिंदे के हाथों बारबार मरती रही हैं. ऐसी नेक औरत की सेवा कर के मुझे गहरा सुकून मिलेगा.’’

कई दिनों के बाद वे दोनों हिंदुस्तान की धरती पर खड़े थे. नूरबाई की आंखों में आंसू थे.

‘‘इस वतन को मेरा सलाम, जिस ने आप जैसी बेटी पैदा की,’’ कहते हुए पठान की आंखों में खुशी की चमक थी. Historical Short Story

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