Story. शाम के 5 बज रहे थे. पार्वती छत से सूखे कपड़े ले कर नीचे उतर रही थी, तभी फोन की घंटी बजने लगी. कपड़े सोफे पर रख उस ने फोन उठा लिया, ‘‘हैलो...’’
‘‘हैलो पार्वती, मैं कंचन बोल रही हूं,’’ उधर से आवाज आई. ‘‘हां दीदी, बोलो...’’
‘‘रात को मैं जरा देर से आऊंगी. खाने पर मेरा इंतजार मत करना.’’ ‘‘ठीक है दीदी,’’ कह कर पार्वती ने फोन रख दिया.
पार्वती समझ गई कि जरूर दीदी का अपने प्रेमी के साथ फिल्म देखने का प्रोग्राम है.
कंचन के प्रेमी के बारे में पार्वती को बस इतना ही पता था कि उस का नाम सुरेश है और वह भी उसी स्कूल में टीचर है, जहां कंचन दीदी पढ़ाती हैं.
कंचन पार्वती की सगी दीदी नहीं थीं, पर वह उन्हें सगी से ज्यादा मानती थी. अगर ऐन मौके पर कंचन न मिली होतीं, तो वह इस दुनिया में शायद ही होती.
पार्वती एक गरीब परिवार से थी. उस के मांबाप ईंटभट्ठे पर काम करते थे. 16 साल की उम्र में पार्वती की शादी नारायण से हो गई थी.
नारायण पेशे से बढ़ई था. साधारण शक्लसूरत के नारायण को पार्वती दिल से स्वीकार नहीं कर पा रही थी.
उन्हीं दिनों नारायण के घर के पास रामखिलावन के खाली मकान में एक खूबसूरत नौजवान किराए पर रहने आया. उस पर नजर पड़ते ही पार्वती के दिल की धड़कनें तेज हो गईं.
एक दिन पार्वती हैंडपंप से पानी भर रही थी, तभी वह लड़का वहां पानी भरने आया.
‘तुम्हारी शादी नहीं हुई है क्या? घर का सारा काम तुम्हीं करते हो?’ पार्वती ने उस लड़के से पूछा. ‘मुझ जैसे को भला कौन अपनी लड़की देगा भाभी?’
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